महफ़िल सजा कर महफ़िल की शाम रंगीन कर गयी
फिर एक तवायफ को दुनिया बदनाम कर गयी
खिली चेहरे पे उसके जो बेबाक सी हँसी
फिर दिल ऐ दर्द मुस्कान होंठो की कर गयी
महफ़िल सजा कर महफ़िल की शाम रंगीन कर गयी
फिर एक तवायफ को दुनिया बदनाम कर गयी
है चाहत सबको जिस्म की – पर अस्मत उसकी मर गयी
कौन पूछे हाल ऐ दिल उसका – तमाशे में फिर वो उतर गयी
लुटती इज़्ज़त दहलीज़ पर – शर्म तार तार उसकी कर गयी
देखा जो चेहरा दर्पण में – नज़रे बदनाम खुद को ही कर गयी
महफ़िल सजा कर महफ़िल की शाम रंगीन कर गयी..
एक छाव की तलाश थी – पर धूप में वो तर रही
उम्मीद में एक प्यार की – सेज बनकर बिखर रही
इस ज़िन्दगी के खेल में – और हसरतो में ताज की
शामों में किसी औऱ की – एक दाम बनकर वो रह गयी
महफ़िल सजा कर महफ़िल की शाम रंगीन कर गयी..
फिर एक तवायफ को दुनिया बदनाम कर गयी……